Sunday, March 23, 2014

भारत - एक नयी खोज

आज़ादी के ६६वें साल में भारत १४वें बार अपने लोकतंत्र से मत माँग रहा है| इस ऐतिहासिक पल पर चलिए कुछ विचारधाराओं को समझें| 
 

हाथ 


६६ साल पहले आज़ादी मिलने पर राष्ट्रपिता गाँधीजी देश विभाजन पर अत्यंत दुखी थे| परंतु नेहरू के कार्यसूची में अनेक मुश्किलें हल करनी थी| ग़रीबी, बेरोज़गारी, भूक, उच्च शिक्षा जैसे| इनको नज़र रखते हुए उन्हे लगा कि देश को समाजवादी विचारधारा अपनाना चाहिए|नतीजा सरकारीउद्योग, सरकारी विश्वविद्यालय, सरकारी ठेका | ६० साल में भूक का हल तो हो गया है| और विश्व भर भारतीय इंजिनियर का नाम हुआ है| यह बात सॉफ है कि अगर देश पूंजीवादी सोंच अपनाता तो अमीर-ग़रीब में फ़र्क और भी ज़्यादा होता| 
 
पर समाजवादी विचारधारा से प्रगती हमेशा धीमे गति से होती है| और इस विचारधारा से मेहनती आदमी को कोई विशेष लाभ नहीं मिलता| इस बीच परिश्रमी या तो निराश होकर अन्य देश में काम ढूंढता है या अन्य की तरह आराम से काम करना अच्छा लगने लगता है| नतीजा सत्या नडेल्ला जो भारतीय मूल के हैं, वो अपने मेहनत का फल अमरीका में पाते हैं| चंद्रशेकर, खुराना, बोस, ऐसे अन्य उदाहरण हैं| 
 
इस बीच भ्रष्टाचार और पैरवी ने देश में बहुत तरक्की की| इतनी तरक्की की राज्य सभा में सदस्यता की कीमत लोगों को अख़बार में पड़ने को आया| हाँ देश में तरक्की हुई है पर शायद भ्रष्टाचार के बिना और ज़्यादा तरक्की देखने को मिलती| 
 
कहाँ "साथी हाथ बढ़ाना" और कहाँ "हाथ से बैंड बजाना" 

 

कमल 


आपातकाल के समय जो ग़लत काम हुए, उनका जवाब लोकतंत्र ने दिया और हाथ से साथ छोड़ा| कुछ साल में हिन्दुत्व विचारधारा का उभरना हुआ| इस विचारधारा के नाम से अन्य मतों को मानने वाले थोडे हिचकिचाए| इस विचारधारा को उग्रवादी रूप भी दिया गया| और इस रूप के कारण हाथ वालों की पार्टी को लाभ हुआ| केमल के साल के शासन में भारत की बहुत प्रगती हुई| अनेक विदेशी उद्योग भारत में स्थापित हुए| भारत ने भी दुनिया को दिखाया कि वो परमाणु विज्ञान में सक्षम है| देश ने भी यह दिखाया कि वो अपने सेमाओं को सुरक्षित रख सकें| 
 
सुशासन से हमेशा लोकतंत्र खुश नहीं रहता| गुजरात में संप्रदायिक दंगों के वजह से शासन करने का दूसरा मौका हाथ से निकल गया| हालाँकि यह बात अलग है की कोर्ट ने मुख्या मंत्री को निर्दोष ठहराया और उसी मुख्य मंत्री ने टीन बार प्रदेश चुनाव जीता| गुजरात प्रदेश में लोगों को शिकायत हैं तो बहुत कम| 
 
कहते हैं कीचड़ कितना गंदा हो उतना खूबसूरत कमल होता है| यह भी कहते हैं कि कमल जितना खूबसूरत है नीचे उतना ही दलदल की गंदगी को छुपाता है| 

 

झाडु 


आम आदमी जहाँ जाए वहाँ पैसे दिए बिया काम नहीं होता| देश में प्रति व्यक्ति ने यह अनुभव कहीं ना कहीं किया होगा| चाहे वो ट्रेन टिकट हो, चाहे गॅस सिलिंडर, चाहे पासपोर्ट, चाहे लाल बत्ती पार करने के बड़े जुर्माने से बचने| यह आदत पुरानी है| हमारी संस्कृति में काम करवाने के लिए इनाम देना आम है| पर यह इस स्थिति पर पहुँच गया है जहाँ सबको कष्ट पहुँचा रहा है| आश्चर्या की बात है कि भगवान का दर्शन भी पैसों के बिना नहीं होता| 
भ्रष्टाचार दुनिया भर है और भारत तक सीमित नहीं| दुनिया भर पैसे लेकर पक्षपात करना आम आदमी के लिए हानि ही पहुँचाया है|  
जब आम आदमी ने आवाज़ उठाया, तो नेताओं ने उन्हे कारवाँ को जाते देख भोंकते कुत्तों से तुलना की| उन्हे चुनाव लड़ने को लगान दिया| पार्टी बनी| एक साल में चुनाव लड़ी गयी| दिल्ली प्रदेश के मतदान में रेकॉर्ड उपस्तिथि हुई | ना हाथ उभरा ना कमल| उभरा घरेलु झाडु| लोगों ने यह बात सुनी कि सरकार चलाने में सफाई, पारदर्शीता और सादगी की ज़रूरत है| 
 

अन्य राष्‍ट्रीय विचार 


हमारा देश में इतनी विविधता है कि हर प्रदेश कि माँगें अलग हैं| इस कारण प्रांतीय पार्टियों की विचारों को साथ में लेके जाना भी ज़रूरी है| इसे "हॉर्स ट्रेडिंग" भी कहलाया जा सकता है| केंद्र में शासन करना चाहे तो इन छोटी पार्टियों से गठबंधन करके जाना बहुत महत्वपूर्ण हो गया है| इसके वजह से २५ साल से कोई शासन अपने पुर विचारों को लागू कर नहीं पातें हैं| 
 
इसका शायद एक हाल है कि राष्‍ट्रीय चुनाव में इन पार्टियों को लड़ने की अनुमति ही ना दें| या तो पार्टी / जगहों से चुनाव लड़ें या स्वतंत्र उम्मेदवार बनकर लड़ें| 
 

२०१४ भारत के लिए महत्वपूर्ण है| बहुत सोचों की परीक्षा है| देखना यह है की पुरानी सोच को दूर रखके आगे की सोच अपना सकें या नहीं|